दे दो मुझे अपने बूट /Give me your boots (Mourid Barghouti)

Israeli police detain a Palestinian protester in the Sheikh Jarrah neighbourhood of East Jerusalem, 5 May 2021 | Ammar Awad/REUTERS/Alamy

दे दो मुझे अपने बूट
दे दो मुझे अपनी बेल्ट
दे दो मुझे अपना ख़ाली थर्मस
दे दो मुझे अपने पसीने से लथपथ मोज़े
दे दो मुझे अपनी महबूबा के नाम अधूरा अध-लिखा खत
दे दो मुझे अपने सुर्ख़ी से तर कपड़े
दे दो मुझे अपनी गली हुई मशीन गन,
दे दो मुझे अपनी आख़री नज़र, अपनी आख़री शुबहा
अपनी हिम्मत, अपना शक, अपने अफ़सोस
अपनी पल-भर के लिए पलायन की ख़्वाहिश
अपना अड़े रहने का निर्णय
दे दो मुझे अपनी थरथराहट
जब प्लेन ने तुम्हारे यार को निशाना बनाया
दे दो मुझे अपने आंसू
जिनके बारे में सब रहे बेख़बर
दे दो मुझे अपना ठिकाना शरणार्थी कैंप का
मैं बचे-कूचे घर ढूंढ लुंगा
बचनेवालों को भी
तुम्हारे शेष परिवार को.
बताऊंगा उन्हें कि तुम कितने अकेले थे
तुम्हारी बातें करूंगा उनसे
तुम्हारी चीज़ें उनको सौंप दूँगा
अगर वो इस क़त्ल-ए-आम में नहीं मरे.
ढेर, लाशों का.
दिलों का ढेर
ढेर, हसरतों का
मट्टी का ढेर
जली हुई औरतों, नन्हों, बूढ़ों,का ढेर
एक घोड़ा जो पानी पीने की कोशिश कर रहा था, उसका शव
छप्परों का ढेर
ढेर, भूले बिसरे रिश्तेदारों का.
पोतड़ों का ढेर.
इस मलबे में, उस छोटे बच्चे की लाश कहाँ है?
और कहाँ गयी उसकी माँ
जिसने उसका नाम रक्खा, उसकी पैदायिश का पहला
हफ्ता मनाया, उसे अपनी छाती देकर शांत किया?
पतीलियों का ढेर
ढेर, झुलसी हुई खुशियों का
इमारत की लोहे की सलाखों का ढेर
आँगन में पड़ा हुआ एक चप्पल.
कहाँ है वो औरत जिसने दुकान-दुकान घूमके, तोल-मोल करके
उसकी नाप, रंग और आकार को चुना?
उसका पतन आंगन में हुआ और
उसका चप्पल आसमान में ऊपर उछला.
आहों और चीखों का ढेर
ढेर, ख़ामोशी का.
ढेर, गिरे हुए घरों का
कुर्सीयों का ढेर
कहाँ है वो शख़्स जो बदस्तूर ख़ुशी से मुस्कुराते हुए
मेहमानों के लिए दरवाज़ा खोलता था?
और हमेशा उन्हें खाने के बाद कॉफ़ी पिलाता था?
ढेर, दवाई की गोलियों का.
कहाँ है वो दादी जो कभी थकती नहीं इस सवाल से:
‘क्या रात के खाने के बाद कोई गोली लेनी है?’
या इस जवाब से: ‘हाँ दादीजान, वो रहीं रात के खाने के बाद वाली.’
ढेर, जली हुई कॉपियों का
ढेर, खिलौनों का
ढेर, थकान का
ग़ुस्से का ढेर
तारीख़ों का ढेर
सब अब ढके हुए मृत्यु की
चुप्पी से छितराये हुए सफ़ेद कफ़न से

अनुवाद: आयेशा किदवाई


Give me your boots
Give me your belt
Give me your empty flask
Give me your sweat-soaked socks
Give me the remaining half page of your letter to your girl
Give me your crimson-wet clothes
Give me your melted machine gun
Give me your last look, your last misgiving
Your courage, your uncertainty, your regret
Your fleeting desire to escape
Your decision to stay on
Give me your trembling when the plane hit your best mate
Give me your tears which went unnoticed
Give me your address at the refugee camp
I’ll look for the remaining houses
The remaining survivors
The rest of your family
I’ll tell them how lonely you were
I’ll talk to them about you
I’ll give them all your belongings
If they haven’t died in the massacre.
A heap of dead bodies
A heap of hearts
A heap of rubble
A heap of yearnings
A heap of dust
A heap of dreams
A heap of charred women, kids, old men
The dead body of a horse who was trying to drink
A heap of roofs
A heap of lost age-old relatives
A heap of nappies
Where’s the baby’s body in this rubble
Where’s the mother who chose its name, celebrated its first week birthday and calmed it with her breast?
A heap of kitchen pans
A heap of scorched joys
A heap of iron bars for construction
A sandal in the yard
Where’s the woman who chose its size, colour and design after window-shopping and bargaining?
She fell in the yard and her sandal flew upward to the sky.
A heap of screams
A heap of silence
A heap of collapsed houses
A heap of chairs
Where’s the man who opened the door with a welcome smile to the guests and served them coffee after dinner?
A heap of medicine pills
Where’s the grandmother who never tired of asking her grandchildren whether they were the pills to be taken after dinner,
and got the same answer:
“Yes, grandma, those are the ones you take after dinner”
A heap of burnt notebooks
A heap of toys
A heap of weariness
A heap of fury
A heap of dates
All now covered by Death’s
silence-dotted white sheet.

Translation: Radwa Ashour

Published by the Indian Cultural Forum

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